Saturday, 18 July 2015

MANTHAN

ये कैसी मोहब्बत ?
मंथन

विदेश में सम्मानस्वदेश में लाठियां कुछ ऐसा ही नज़ारा चंद दिनों पहले जंतर-मंतर पर उस वक्त देखने को मिला जब एसिड अटैक सरवाइवर लक्ष्मी समेत एसिड अटैक के विरुद्ध प्रदर्शन कर रहे वालंटियर्स और सरवाइवर्स पर गालियों,लाठियों की बरसात कर दी।
वास्तव में इनके द्वारा उठाई जा रही ये सामान्य-सी मांगे इनकी निजी हित के लिए नहीं बल्कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक मजबूत कदम है।  एसिड अटैक का दर्द झेल रही मासूम लड़कियों को मुफ्त ईलाज या मुआवजा देकर बदलाव नहीं लाया जा सकता और ही महिला सशक्तिकरण की खोखली बातें की जा सकती है। लेडी डॉक्टर पर एसिड अटैक की हाल में घटी घटना ने एक बार फिर से समाज और कानून को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है।

औरतों को नीचा दिखाना ये कैसी मर्दानगी
ये कैसी सब्ज़ी बनाई हैं घी-मसालों की कमी है क्या ? और... फिर एक थप्पङ की गूँजबचपन में अपनी सहेली के घर में देखा हुआ कुछ ऐसा ही नज़ारा अभी तक मेरे ज़ेहन में ताज़ा है।  भारतीय सभ्यता में शायद ये आम बात है जो लगभग हर घर में होती है लेकिन क्या हमारी सभ्यता हिंसा सिखाती है ? औरतों का मर्दों की बेवजह की इच्छाओं को पूरा करने पर उन्हें शारीरिक-मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। असल में रिजेक्शन (नकारा जाना ) की हिम्मत अधिकतर लोगों में नहीं होती वो किसी के द्वारा इंकार किये जाने को अपने अहम (ईगो) से जोड़कर देखते है। कहीं कहीं बचपन से  हर चीज़ को पाने की प्रवृत्ति इतनी प्रबल हो जाती है कि ऐसे लोग किसी इंसान को भी एक वस्तु समझने लगते हैं। जबकि सच्चाई ये है कि इंकार को स्वीकार करने की हिम्मत कमजोरों में नहीं बल्कि मजबूत इरादों के लोगों में होती है।
रिजेक्शन से जुड़ा एक दूसरा पहलू ये भी है कि जब शादी के लिए देखने आया लड़का और उसके परिवारवाले पढ़ी-लिखी लड़की तक को नापसंद कर देते तो क्या लड़की,लड़के को अकेला देखकर उस पर एसिड अटैक कर देती है? आज हम सभी को ये समझने की जरूरत है कि रिजेक्शन सिर्फ ज़िन्दगी का पहलू है,पूरी ज़िन्दगी नहीं।
असली ताकत मन को छूने में है तन को नहीं
कभी बस में...कभी मेट्रो तो कभी गली-मोहल्लों में लगने वाले बाज़ारों में चोरी-छिपे लड़कियों को छूना इन्हें अपना हक़ लगता है जबकि असली ताकत प्यार और सम्मान से लड़की के मन को जीतने में है। छोटी मांनसिकता वाले लोगों को ये सोचना चाहिए कि एसिड अटैक से चेहरा ख़राब करने के बाद भी लड़की के मन में ऐसे लोगों के लिए सिर्फ नफरत ही रहेगी और पूरी दुनिया के अपनाये जाने पर भी वो लड़की कभी भी वापस नहीं लौटेगी इसलिए जीतना है तो मन जीतो और बनो 'रियल मैन' की 'कायर मैन'

 इन्हें भी कुछ सिखाओ
वाह! मेरे शेर तो.और थप्पड़ और मारने थे.बचपन में किसी के खिलौने पसंद आने पर जब कोई उसे नहीं देता था,तो खिलौने को तोड़ना या उस बच्चे की पिटाई करने पर कुछ ऐसे ही शब्दों से अक्सर बच्चों को नवाजा जाता है या फिर हसी-मज़ाक में टाल दिया जाता है लेकिन क्या आपने सोचा है जाने-अनजाने आप उसमें पनप चुके मनोविकार को बढ़ावा दे रहे हैं। जिससे आगे जाकर कितने घर बर्बाद होंगे। अब वक्त गया है कि लड़कियों के अलावा उन्हें भी कुछ सिखाया जाये, बदसूरती और खूबसूरती के सही अर्थों के साथ प्यार जैसे आत्मिक अनुभव के मायने को भी समझाया जाना बेहद जरुरी है।

ये कैसी मोहब्बत
कोई शायर बन गया तो कोई चित्रकार बन गया
जो मुश्किल हुआ जीना उनके बिना तो.मोहब्बत के फलसफे को ही सीने में दफ़न कर दिया।
कहते है सिनेमा असल ज़िन्दगी का अक्स है। पुरानी फिल्मों में अक्सर ये देखने को मिलता था कि हीरो की शादी अपने प्यार से होने पर या तो वो उम्र भर शादी नहीं करता या फिर किसी काम में इतना मसरूफ कर लेता है कि कामयाबी उसके कदम छूती है और अपनी प्रेरणा वो अपने प्यार को मानता है तो कहीं खुद को गम के सागर में डूबाकर दिन-रात मयखानों के आगोश में रहता है लेकिन भूलकर भी अपनी प्रेमिका के घर को बर्बाद करने के सपने नहीं देखता लेकिन आज समय बदल चुका है और सिनेमा भी,आज रिजेक्शन पर तुरंत नेगेटिव रिएक्शन करने को अपनी बहादुरी समझा जाता है। एक पल में 'आई लव यू' कब 'एसिड अटैक' जैसे घिनौने अपराध में बदल जाता है ये बात सोच से दूर लगने लगती है।

आधुनिक समय में युवाओं को प्यार और पागलपन दोनों के बीच के फर्क को समझना चाहिए। प्यार तो जीना सिखाता है किसी की जान लेने या खुद की जान देने की सोच रखने वाले लोग प्यार की वास्तविकता से कोसों दूर होते हैं प्यार बिगाड़ने का नहीं, बनाने का नाम है।
प्रतिमा जायसवाल 'प्रीति                                                                                                                                                                 

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